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Wednesday, August 24, 2011

अन्ना की अपील












धीरे-धीरे जकड़ रही हैं जंजीरें
धीरे-धीरे बिगड़ रही हैं तकदीरें
धीरे-धीरे कर्ज चढ़ा ही जाता है
भ्रष्टाचार का मर्ज बढ़ा ही जाता है

धीरे-धीरे हम लांघ रहे सीमा हर बर्बादी की
फिर से लडऩे ही होगी इक और जंग आजादी की


मैं अन्ना हूँ, जुल्म नहीं सह सकता हूँ
बर्बादी पर मौन नहीं रह सकता हूँ
मैं बंधक आजादी की तस्वीर दिखाने आया हूँ
गली-गली में नई क्रांति का ज्वार जगाने आया हूँ
देश के सिर से भ्रष्टाचार का दाग मिटाने आया हूँ
आजादी का खतरे में है, बस ये समझाने आया हूँ

खतरे में अस्मत लगती है गाँधी वाली खादी की
फिर से लडऩी ही होगी एक और जंग आजादी की

मैं अपने शब्दों में अब बारूद भर रहा हूँ प्यारे
लोकतंत्र खतरे में है आगाह कर रहा हूँ प्यारे
फिर इक अडिय़ल सत्ता से टकराने को तैयार रहो
कफन बाँधकर वंदेमातरम गाने को तैयार रहो
दीवारों में फिर बच्चे चिनवाने को तैयार रहो
स्वाभिमान से घास की रोटी खाने को तैयार रहो

भूल नहीं जाना बैचेनी मेरी काव्य मुनादी की
फिर से लडऩी ही होगी इक और जंग आजादी की

Thursday, December 9, 2010

जन्मपत्री बनाम कर्मपत्री

मित्र ने कहा
लड़का-लड़की
शादी के लिए बेकरार!
दोनों के परिवार भी तैयार!!
लेकिन उनकी जन्मपत्रियों में
गुण नहीं मिल रहे हैं यार!!!

मैंने कहा- दोस्त!
नई तकनीक काम में लाओ
जन्मपत्रियों में
गुण नहीं मिल रहे हैं
तो कर्मपत्रियों के दोष मिलाओ

वह दोनों के
समान दोषों की
सूची बनाकर लाया

और बताया-
लड़का भी देरी से उठता है
लड़की भी देरी से उठती है
लड़का भी सिगरेट पीता है
लड़की भी सिगरेट पीती है
लड़का भी पढ़ाई में डफर
लड़की भी पढ़ाई में सिफर
लड़का भी आवारा
लड़की भी आवारा
लड़का भी रोज शेव बनाता है
लड़की भी रोज शेव बनाती है

मैंने कहा-
उत्तम दोष योग है
यह रिश्ता कभी नहीं तिड़केगा
अरे! दो घर बिगड़ते
अब एक ही बिगड़ेगा

रिश्ता करवाना ही है
तो जन्मपत्रियों में
खोपड़ी बाद में खपाओ
पहले दोनों की ब्लड टेस्ट की
रिपोर्ट मँगवाओ
एचआईवी निगेटिव पाओ
तब गुण-दोष मिलाओ
सलाह का यही सार है
बचाव ही उपचार है

Monday, February 22, 2010

क्राइम शो की एंकरिंग

एक दिन किसी दोस्त ने मुझ पर यह सलाहात्मक प्रश्न दाग दिया कि तुम किसी न्यूज चैनल पर क्राइम शो की एंकरिंग क्यों नहीं करते? मैंने जवाब दिया कि दोस्त टीवी के प्रोग्राम में तो चॉकलेटी चेहरे वाले लड़के-लड़कियां एंकरिंग करते हैं। दरअसल मेरी शक्ल एंकरिंग के लायक नहीं है। मेरा जवाब सुनते ही वह मेरी अवधारणा का खण्डन करते हुए बोला- "क्राइम शो की एंकरिंग के लिए तो वे छाट-छाट कर बदसूरत वाले चेहरे लाते हैं। तुम तो उसके लिए बिल्कुल फिट हो।" मैं समझ गया कि जिसके ऐसे दोस्त हों उसे दुश्मनों की क्या जरूरत?
खैर, क्राइम शो का एंकर अपनी कर्कश आवाज और भयानक मुख मुद्रा से डरा-डरा कर आपको अपना प्रोग्राम देखने के लिए मजबूर कर देता है। वह बताता है कि क्यों दिया अमुक औरत ने अपने ही पति को जहर? किसलिए किया उसने अपने सगे भाई का कत्ल? किस डकैती के पीछे निकला घर में काम करने वाली नौकरानी का हाथ? आपका समूचा आत्म विश्वास हिला देने के बाद वह बताता है कि ये सब आप के साथ भी हो सकता है।
किसी भी प्रकार टीवी के प्रोग्राम में अपना चेहरा दिखाने की लालसा ने क्राइम शो की एंकरिंग के लिए मुझसे जो स्कि्रप्ट लिखवाई वह इस प्रकार है-


चैन से सोना है तो अब जाग जाओ। बीवी को देखो गुस्से में तो बिस्तर छोड़कर भाग जाओ। खबरें तो सिर्फ बहाना हैं। हमें तो आपको डरा-डरा कर बाहदुर बनाना है।
थानेदार के हाथ से होने वाली पिटाई और बीवी के हाथों से होने वाली धुनाई में सिर्फ एक ही फर्क आता है कि थानेदार को तो फिर भी रहम आ जाता है, बीवी को रहम नहीं आता है। बीवी को अपने शौहर पर रहम की जगह सिर्फ बहम आता है। पेश है इस बारे में अहमदाबाद से हमारे क्राइम रिपोर्टर कुमार झूठा की ये सच्ची रिपोर्ट-
टीवी की स्क्रीन पर हाथ में माइक थामे कुमार झूठा यूं प्रकट होते हैं जैसे कि वे सत्यवादी हरीशचन्द्र के कलयुगी अवतार सिर्फ वे ही हों। वे सिलसिलेवार बताना शुरू करते हैं-
तीस फरवरी का मनहूस दिन था। (यह बात वही जाने कि यह तिथि किस कलेण्डर की शोभा बढ़ाती है) और उसी दिन खेला गया यह खूनी खेल, जिसे देखकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे (अगर वे पहले से ही खड़े न हों)।
(अब कुमार अपनी बात को आगे बढ़ाता है-) ये हैं अहमदाबाद के भोला भाई। इनकी पत्नी खूंखार बेन ने ऐसी की इनकी धुनाई कि नाक से खून बह रहा है। हमले में बेलनाकार हथियार का जमकर इस्तेमाल हुआ था।
इस बारे में भोला-भाई मूर्च्छित होने की वजह से कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे लिहाजा हमने खूंखार बेन से ही बात की।
प्रश्न- क्या आप अपने पति को रोजाना पीटती हैं?
उत्तर- रोजना टाइम किसे मिलता है।
प्रश्न- तो आप अपने पति को कब पीटती है?
उत्तर- एक दिन छोड़कर सब दिन पीटती हूँ।
प्रश्न- एक दिन छोड़कर एक दिन किसलिए?
उत्तर- इसलिए कि मारने के बाद पुचकारना भी तो पड़ता है।
प्रश्न- मारती हैं तब पुचकारती क्यों हैं?
उत्तर- पुचकारूँगी नहीं तो ये घर छोड़कर भाग नहीं जाएगा।
फिर पिटने के लिए खुद पड़ौसन का आदमी थोड़े ही आएगा। इस काम के लिए तो खुद का पति ही ठीक रहता है जो अपने आप नियम से आए और पिट ले।
आइये देखते हैं कि इस बारे में प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. भेजा चाटिया का क्या कहना है? (स्क्रीन पर डॉ. भेजा चाटिया प्रकट होकर बताते हैं)
आजकल शादी दो आत्माओं का पवित्र मिलन नहीं बल्कि दो आत्माओं की भयानक भिड़न्त का नाम है। किसी भी बीवी को अपने पति को पीटने का शौक नहीं होता (एडिक्शन) आदत होती है। दरअसल ये तेजी से फैलता हुआ नया रोग है 'प्मोर्सं' -PMORS, जिसका फुल फार्म है- पोस्ट मैरीज ओल्ड रिवेंज सिन्ड्रोम। अभी तक इसका उपचार नहीं खोजा जा सका है, इसलिए कुछ बातों का ध्यान रखकर सिर्फ अपना बचाव ही किया जा सकता है। जैसे अगर आप टू व्हीलर व्हीकल चलाते हैं तो हैलमेट पहनकर ही घर में घुसें। फिर घर का माहौल देखकर ही हैलमेट उतारें। और अगर आप कार यूज करते हैं तो पहले से ही आऊटिंग का प्रोग्राम बना लें। खुद घर में घुसने की बजाय पत्नी को बाहर बुलाएं। इन छोटी बातों को अपनी आदत बनाकर इस रोग के प्रभावों से बचा जा सकता है।
अभी वक्त है एक ब्रेक का। ब्रेक के बाद क्राइम रिपोर्टर बताने वाला है कि किसी-----------?

Friday, February 19, 2010

मोबाइल और मिसेज

मोबाइल और मिसेज में बहुत समानताएं हैं। यह तय करना मुश्किल है कि दोनों में से कौन ज्यादा बड़ी बीमारी है? दोनों के प्राइस प्लान जेबकाटू होते हैं और संवाद माथा चाटू। शुरू-शुरू में आदमी दोनों को शौक-शौक में रखता है और बाद में सारी जिन्दगी इस महंगे और अनअफोडेबल शौक का मजा चखता है।

मोबाइल और मिसेज दोनों का यद्यपि बीमा होता है। लेकिन बीमे का ये नुस्खा कभी फायदा नहीं करता क्योंकि क्लेम पाने के चक्कर में जिन्दगी भर प्रीमियम भरना पड़ता है। मोबाइल और मिसेज दोनों को घर में लाने के बाद हर आदमी पछताता है। पछताते-पछताते वह सोचता है कि चैन से सोने के लिए मैं जिन्हें घर में लाया था, उन्हीं की वजह से नीन्द हराम हो गई है। इतनी जल्दबाजी में इन्हें घर में ले आने का फैसला ठीक नहीं था। कुछ दिन रुक जाते तो शायद और नया मॉडल मिल जाता।

सिर्फ समानताएं ही नहीं हैं। मोबाइल और मिसेज में अन्तर भी बहुत हैं। मोबाइल को तो आप फिर भी स्विच ऑफ कर सकते हैं लेकिन मिसेज को नहीं। करना तो दूर सोचना भी रिस्की है। उसे जरा सी भी भनक लग गई तो वह आपको स्विच ऑफ तो कर ही सकती है। और मान लो वह वापस ऑन करना भूल गई तो लेने के देने पड़ जाएगे।

मोबाइल चेंजेबल होता है किन्तु मिसेज अनचेंजेबल, बल्कि अनचैलेंजेबल। लोग बताते हैं कि मोबाइल के तो बाजार में अक्सर एक्सचेंज ऑफर आते रहते हैं। कम्पनियां पेपर में एड दे देकर कहती हैं कि पुराना लाओ और नया ले जाओ। लेकिन मिसेज के मामले में यह सुविधा किसी को भी प्राप्त नहीं है। मोबाइल की तो गारण्टी-वारण्टी भी होती है लेकिन मिसेज की न कोई गारण्टी, न वारण्टी और न ही रिपलेसमेंट, टोटली डूबा हुआ इन्वैस्टमेंट।

अपना तो काम ही सोचने का है, अतः समानताओं और असमानताओं के मैं कई और बिन्दु भी खोज सकता था लेकिन तभी मेरे दिमाग में अचानक उठे विचार ने मुझे विचलित कर दिया। मैं सोचने लगा कि अगर मेरी ही तरह मिसेज भी मोबाइल और हसबैण्ड में तुलना करने लगी तो गजब हो जाएगा। उस तुलना के नतीजों की कल्पना मात्र से ही मेरे पसीने छूटने लगे हैं, इसलिए मैं घबराकर इस लेख को यहीं पर विराम दे रहा हूँ.

Thursday, February 11, 2010

प्यार इक कठिन तपस्या


वेलेन्टाइन डे मना, था मैं भी तैयार।
चला प्यार की ओट में, करने नया शिकार॥
देख इक सुन्दर लडकी।
भावना मेरी भडकी॥

मैंने लडकी से कहा, देकरके इक फूल।
आजा मेरी माधुरी, मैं तेरा मकबूल॥
मेरे सपनों की रानी।
बनाएँ प्रेम कहानी॥

ना ना जी उसने कहा, खूब पडेगी मार।
पहलवान की बहिन से, हुआ आपको प्यार॥
अगर ये फूटा भण्डा।
यहीं कर देगा ठण्डा॥

मैंने वापस ले लिया, उससे अपना फूल।
मुझको दिखी अधेड सी, इक महिला अनुकूल॥
फूल दे हृदय टटोला।
प्यार से मैं यों बोला॥

न्योत रहा हूँ मैं तुझे, बन जा मेरी फ्रैण्ड।
तू भी सैकिण्डहैण्ड है, मैं भी सैकिण्डहैण्ड॥
साधना मेरी डोले।
आज तू मेरी हो ले॥

पर मेरी तकदीर में, लिखी हुई थी खोट।
लिपट गई; खिसका लिये, जेब से सारे नोट॥
चोट पैसों की खाई।
तभी घरवाली आई॥

वेलेन्टाइन डे यहाँ, है काँटों का हार।
काम साधकों के लिए, मृगतृष्णा है प्यार॥
प्यार इक कठिन तपस्या।
वासना जटिल समस्या॥

Saturday, February 6, 2010

प्रेमी-प्रेमिका युद्ध


प्रेमिका बोली ताने मार
अरे ओ मजनूं के अवतार!
जैसे कोई रद्‌दी अखबार!

ढोंगी जैसे कोई पुजारी
खतरनाक ज्यों बस सरकारी
तू और तेरी ईमानदारी
जैसे गाँवों में पटवारी

रोज समय पर मुझे बुलाता
नल की तरह लेट खुद आता
फिर भी कारण नहीं बताता
बोल-बोल तू क्यों हैं मौन?
आदमी है या टेलीफोन?
कहाँ गई तेरी डायलटोन?

प्रेमी बोला-ओ मेरी रानी!
फ्लाप फिल्म की घिसी कहानी
देरी से जो भी आता है
बडा वही माना जाता है
तुमको मैं ऐसे समझाता
पहुँचा करती चिट्‌ठी जल्दी
तार सदा देरी से जाता

प्रेमिका बोली होकर खारी
वाह रे बुद्धि से ब्रह्मचारी!
बडा स्वयं को बतलायेगा
नखरे इतने दिखलायेगा
नए बहाने सरकाएगा
हर वादे को बिसराएगा
आश्वासन से भरमाएगा
मुझको क्या मालूम था प्यारे
तू भी नेता बन जायेगा

अस्पताल का वार्ड है तू
फर्जी राशन कार्ड है तू
नकली चकाचौंध है तू
बढती हुई तोंद है तू
पोस्ट ऑफिस का गोंद है तू

शाम को मेरे घर पर आना
खुद आकर मेरे डैडी से
शादी की तू बात चलाना

प्रेमी बोला-ओ माई डीयर!
एक बात समझ लो क्लीयर
डैडी दिख जाता जब तेरा
बदन काँप जाता है मेरा
मेरे मन में भय जगता है
प्रेम सडक पर तेरा डैडी
मुझे स्पीड ब्रेकर लगता है

प्रेमिका बोली पर तू बढ जा
अपनी ही चाहत पर अड जा
बीमे के एजेण्ट सरीखा
जाकर छाती पर ही चढ जा

प्रेमी बोला-ओ मेरी प्यारी!
मुझको डर लगता है भारी
आखिर कैसे रिस्क उठाऊँ
तेरा बाप पुलिस अधिकारी

सारा मजनूँपन हर लेगा
नमक वो चमडी में भर देगा
तेरे बस थप्पड मारेगा
मुझको तो अन्दर कर देगा

प्रेमी को जब डरते देखा
आत्म समर्पण करते देखा
प्रेमिका विकराल हो गई
आँखे उसकी लाल हो गई

कहने लगी ओ पंचर टायर!
पढे-लिखे से ज्यादा कायर!
अब तक नहीं समझ में आया
तूने जीवन व्यर्थ गँवाया
सोचता है जो कर नहीं पाता
वाह रे भारत के मतदाता!