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Tuesday, February 16, 2010

मैरिज का मास्टर प्लान


आदमी अपने पुरुषार्थ के बूते पर प्रधानमंत्री तो बन सकता है लेकिन इससे उसकी शादी भी हो जाए, यह जरूरी नहीं है। जिन्दगी के इस डिपार्टमेंट में पुरुषार्थ का रोल कम और प्रारब्ध का ज्यादा होता है।

नौकरी नहीं मिलने की वजह से मेरी शादी का प्रोजेक्ट पूरी तरह से खटाई में पड चुका था। मैं मन ही मन बहुत परेशान था। मुझसे भी ज्यादा परेशान थे मेरे मोहल्ले वाले। रिश्तेदार आशंकित और पडौसी आतंकित। कुल मिलाकर मेरा कुँवारापन एक विकराल समस्या बनकर उभर रहा था।

मैं मार्केटिंग का विशेषज्ञ था इसलिए मुझे अपने पुरुषार्थ पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था। किसी भी परिस्थिति में मैं हिम्मत हारने वाला नहीं था। अतः मैंने समाज के सभी वर्गों के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी मैरिज का मास्टर प्लान बनाया।
सबसे पहले मैंने अखबार में विज्ञापन छपवाने की सोची। लेकिन यह फैसला मैंने पहले ही ले लिया था कि अखबार में विज्ञापन तो देंगे क्लासीफाइड में नहीं देंगे क्योंकि विवाह योग्य युवतियों के बुढाते हुए पेरेन्ट्‌स क्लासीफाइड के बारीक अक्षरों को ठीक से नहीं पढ सके तो सारा गुड गोबर हो जाएगा। इसलिए फोटो सहित अलग से विज्ञापन छपना चाहिए ताकि सबकी नजर पडे। विज्ञापन का मैटर भी मैंने पूरा दिमाग लगाकर बनाया। लिखा कि विवाह की इच्छुक युवतियाँ निःसंकोच अपना बायोडेटा भेजें, बिल्कुल नहीं डरें। विवाह योग्य वर-कवि सुरेन्द्र दुबे। पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्र्वास करें।''

अखबार के दफ्तार में अपना यह विज्ञापन सौंपते हुए मैंने टेबल पर पडे अखबार को बडी हसरत से निहारा। बाकायदा उसे अपने सिर से लगाकर कहा-एक तेरा सहारा।'' अब मैं पूरी तरह निश्चिंत था। मैंने सोचा कि विवाह योग्य लडकियों के पेरेन्ट्‌स को नींद तो आती नहीं। कल सुबह पाँच बजे अखबार में विज्ञापन देखते ही सात बजे तक तो मेरे घर आ जाएँगे। कल से अपना भाग्य बदलने वाला है, यह सोचकर मैं सो गया। लेकिन मेरी तकदीर ही खराब थी। इस बार संपादक ने गलती कर दी। वैवाहिक विज्ञापनों के पन्ने पर छापने की बजाय उसने गलती से मेरा विज्ञापन शोक समाचार वाले पेज पर छाप दिया।

शोक समाचार वाले पेज पर छपने वाले विज्ञापनों को कोई भी ध्यान से नहीं पढता। सिर्फ फोटो देखते ही समझ जाता है कि इसका विकेट उड चुका है। लिहाजा लडकियों के पेरेन्टस तो आए नहीं लेकिन सुबह-सुबह मेरे घर के बाहर शवयात्रा में शामिल होने वाले लोगों का जमघट जरूर लग गया।

लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने तुरंत एक मैरिज ब्यूरो खोल लिया। अपने आफिस पर बडा सा बोर्ड टाँगकर उस पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखवाया- दुल्हन वही जो दुबेजी दिलाएँ।'' चार दिन बाद बगल में दूसरा आफिस खुल गया जिसके बोर्ड पर लिखा था- तलाक वही जो चौबे जी कराएँ।''

चौबे ने सोचा कि दुबे जो खुद शादी नहीं कर सका, जरूर दूसरों के ऊटपटांग रिश्ते करवाएगा। ऐसे में इसका हर कस्टमर छः महीने बाद रोता हुआ मेरे पास आएगा। उसे सफलता के लिए अपनी योग्यता की तुलना में मेरी अयोग्यता पर ज्यादा भरोसा था। दोनों की कोशिशें अलग-अलग तरह की थीं। मैं बंधन बेच रहा था और वह मुक्ति। सामाजिक सरोकारों से शून्य लोगों की मजबूरी है कि कभी मेरे पास आए और कभी उसके पास जाए। लेकिन हम दोनों के मन में पता नहीं कौन सा डर है कि दोनों की नजर में एक दूसरे का कस्टमर है।

Thursday, February 11, 2010

प्यार इक कठिन तपस्या


वेलेन्टाइन डे मना, था मैं भी तैयार।
चला प्यार की ओट में, करने नया शिकार॥
देख इक सुन्दर लडकी।
भावना मेरी भडकी॥

मैंने लडकी से कहा, देकरके इक फूल।
आजा मेरी माधुरी, मैं तेरा मकबूल॥
मेरे सपनों की रानी।
बनाएँ प्रेम कहानी॥

ना ना जी उसने कहा, खूब पडेगी मार।
पहलवान की बहिन से, हुआ आपको प्यार॥
अगर ये फूटा भण्डा।
यहीं कर देगा ठण्डा॥

मैंने वापस ले लिया, उससे अपना फूल।
मुझको दिखी अधेड सी, इक महिला अनुकूल॥
फूल दे हृदय टटोला।
प्यार से मैं यों बोला॥

न्योत रहा हूँ मैं तुझे, बन जा मेरी फ्रैण्ड।
तू भी सैकिण्डहैण्ड है, मैं भी सैकिण्डहैण्ड॥
साधना मेरी डोले।
आज तू मेरी हो ले॥

पर मेरी तकदीर में, लिखी हुई थी खोट।
लिपट गई; खिसका लिये, जेब से सारे नोट॥
चोट पैसों की खाई।
तभी घरवाली आई॥

वेलेन्टाइन डे यहाँ, है काँटों का हार।
काम साधकों के लिए, मृगतृष्णा है प्यार॥
प्यार इक कठिन तपस्या।
वासना जटिल समस्या॥