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Thursday, December 9, 2010

जन्मपत्री बनाम कर्मपत्री

मित्र ने कहा
लड़का-लड़की
शादी के लिए बेकरार!
दोनों के परिवार भी तैयार!!
लेकिन उनकी जन्मपत्रियों में
गुण नहीं मिल रहे हैं यार!!!

मैंने कहा- दोस्त!
नई तकनीक काम में लाओ
जन्मपत्रियों में
गुण नहीं मिल रहे हैं
तो कर्मपत्रियों के दोष मिलाओ

वह दोनों के
समान दोषों की
सूची बनाकर लाया

और बताया-
लड़का भी देरी से उठता है
लड़की भी देरी से उठती है
लड़का भी सिगरेट पीता है
लड़की भी सिगरेट पीती है
लड़का भी पढ़ाई में डफर
लड़की भी पढ़ाई में सिफर
लड़का भी आवारा
लड़की भी आवारा
लड़का भी रोज शेव बनाता है
लड़की भी रोज शेव बनाती है

मैंने कहा-
उत्तम दोष योग है
यह रिश्ता कभी नहीं तिड़केगा
अरे! दो घर बिगड़ते
अब एक ही बिगड़ेगा

रिश्ता करवाना ही है
तो जन्मपत्रियों में
खोपड़ी बाद में खपाओ
पहले दोनों की ब्लड टेस्ट की
रिपोर्ट मँगवाओ
एचआईवी निगेटिव पाओ
तब गुण-दोष मिलाओ
सलाह का यही सार है
बचाव ही उपचार है

Wednesday, July 28, 2010

रेल दुर्घटना



अब अगर कोई किसी से भी यह सवाल पूछे कि आजकल भारतीय रेलें कैसी हैं? तो जवाब मिलेगा कि बिल्कुल रेलमंत्री जैसी हैं। जैसी रेलमंत्री हैं, वैसी ही रेलें हैं। दोनों को ही सिग्नल दिखाई नहीं देते। दोनों ही चाहे जब, जिस किसी से टकराने के मूड में रहती हैं। दोनों के ही पास ऐसे टकराव की कोई वजह नहीं होती। हाँ टक्कर इतनी भयानक होती है कि देखने वाले डर जाते हैं। कुछ तो टक्कर की दहशत से ही मर जाते हैं।
पिछले चुनावों में उनकी टी.एम.सी. एक्सप्रेस ने सीपीएम एक्सप्रेस के ऐसी टक्कर मारी कि कांग्रेस का बायां और बीजेपी का दायाँ कान फट गया। घायल सीपीएम तो तब से अब तक शायद अस्पताल में भर्ती है।
रेल दुर्घटना में कई लोग मरे। जो मरे उन पर आश्रित लोग जीते जी ही मरे समान हो गए। रेल मंत्री का सारा ध्यान पश्चिम बंगाल के चुनावों पर है। रेल यात्री मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष गुहार लगा रहे हैं कि वे पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव जल्दी करवा दें। अगर वे जीत गईं तो पश्चिम बंगाल की सीएम बन जाएँगी और और अगर हार गई तो प्रधानमंत्री में उनका मंत्रालय बदलने की हिम्मत आ जाएगी। दोनों ही स्थितियों में रेलयात्रियों को राहत मिल जाएगी।
लोग कहते हैं कि नैतिकता के आधार पर उन्हें त्यागपत्र देना चाहिए। यह गलत बात है। राजनीति में नैतिकता को आधार बनाना गलत है। आधार हमेशा नीचे रहता है। ऐसे में नैतिकता के आधार पर चलने वाला राजनेता नैतिकता को कुचल देता है। नैतिकता की रक्षा करना प्रत्येक राजनेता का धर्म है। जरूरी है कि आधार वह स्वयं बने और फिर नैतिकता को जैसा चाहे वैसा चलाए। आजकल की राजनीति यही कहती है। अगर रेल दुर्घटनाओं में इजाफा हुआ तो हो सकता है प्रधानमंत्री जनसंख्या नियंत्रण विभाग का भी प्रभार उन्हें सौंप दें।
फिलहाल उन्हें ध्यान रखना होगा कि फिलहाल वे रेलमंत्री हैं, जनसंख्या नियंत्रण मंत्री नहीं। वे चाहें तो यह बयान जारी कर सकती हैं कि रेल दुर्घटनाओं से बीमा कम्पनियों के कारोबार में उछाल आएगा जो कि बीमे के कारोबार और देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है।


Wednesday, June 30, 2010

शादी में स्टेआर्डर

"मियाँ-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी?" लेकिन काजी की नाराजी कभी भी पलट सकती है बाजी। इसलिए अब शादी के लिए मियाँ-बीबी के साथ-साथ काजी का राजी होना भी जरूरी है। शादी करके कोई भी पक्ष मुकर जाए तो फिर गवाही में काजी ही काम आएगा और उस काजी की गवाही के आधार पर विवाद का फैसला भी कोई काजी ही करेगा। इसलिए ध्यान रखना चाहिए कि मियाँ-बीबी राजी फिर भी कुछ न कुछ तो कर ही सकता है काजी।
शादी जब मुनष्यों की हो तो प्राय: एक ही काजी होता है लेकिन बैंकों की शादी में तो जिधर देखो उधर एक अलग काजी खड़ा दिखाई देता है। ऐसे में एक भी काजी की नाराजगी से सारा गुड़-गोबर हो सकता है। अभी बैंक ऑफ राजस्थान संग आई।सी।आई।सी।आई. बैंक के आशीर्वाद समारोह की योजना बन ही रही थी कि एक काजी साहब ने सगाई समारोह के आयोजन के खिलाफ बैंक ऑफ राजस्थान के परिवाजनों की शिकायत पर स्टेआर्डर जारी कर दिया। दूसरे काजी साहब ने परिवारजनों की मीटिंग पर स्टेआर्डर दिया।

स्टेआर्डर का अर्थ होता है- यथास्थिति। यानी अगला आदेश मिलने तक आप न तो आगे बढ़ सकते हो और न ही पीछे हट सकते हैं। जो, जिस स्थिति में है वह, उसी स्थति में यथास्थिति को बनाए रखेगा। अब मियाँ-बीबी आपस में राजी रहकर भले ही शादी के लिए खूंटे तुड़वाते रहें, लेकिन काजी की राजी के बिना मियाँ-बीबी के राजी होने का कोई मतलब ही नहीं रहा। परिणाम सामने है। दुल्हा और दुल्हन अगला आदेश मिलने तक सगाई, विवाह, विदाई और आशीर्वाद समारोह का आयोजन तो नहीं ही कर सकेंगे बल्कि उनके परिजन इन कार्यों की योजना बनाने के लिए निमित्त अधिकृत रूप से मिल भी नहीं सकेंगे। यह तो अच्छा हुआ जो यह स्टेआर्डर सगाई के मौके पर ही आ गया, अगर सुहागरात के समय स्टेआर्डर आ जाता तो परेशानी किसी भी स्तर तक बढ़ सकती थी।
बैंक ऑफ राजस्थान के परिवारजनों का मानना है कि यह रिश्ता ठीक नहीं है। आई.सी.आई.सी.आई बैंक इस शादी के होते ही उन्हें सताना शुरू कर देगा। इस रिश्ते के जरिये दरअसल वह बैंक ऑफ राजस्थान को डकारना चाहता है। अगर उनकी यह आशंका सही है तो इसे कहेंगे भारत में विदेशी बैंकों द्वारा आर्थिक आतंकवाद की शुरुआत।

खैर, जो भी हो साफ-सथुरा और पारदर्शी तरीके से हो। ऐसा न होने पर गड़बड़-घोटाले की संभावना बनी रहेगी। परिणाम शुभ नहीं होंगे। जैसे शादी के बाद हम शुभकामना के टेलीग्राम में लिखेंगे "आपका दाम्पत्य मंगलमय हो।" तार विभाग ने अगर साफ-सुथरे तरीके से काम नहीं किया तो वहाँ पहुँचे तार में लिखा होगा- "आपका दाम्पत्य दंगलमय हो।"

Tuesday, June 15, 2010

मूल निवास प्रमाण पत्र

पिछले दिनों अपनी बिटिया का मूल निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सुबह ठीक साढे दस बजे कलेक्ट्रेट पहुँचा। दिन भर वहाँ के बाबुओं ने मुझे ऐसा चकरधिन किया कि शाम पाँच बजते-बजते तो मैं खुद अपना मूल निवास भूल गया। समस्या यह खड़ी हो गई कि अपना पता याद रह न रहने पर मैं घर कैसे जाऊँ? मजबूरी में मैंने मूल निवास प्रमाण पत्र के लिए अप्लाई किया तब जाकर घर लौट सका।

हुआ यों कि सावधानी से भरकर प्रस्तुत किए गए फॉर्म को बाबू ने लापरवाही से रिसीव किया। मैंने निवेदन किया-''देख लीजिए कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई है?" मैंने कहा-''मेरा परिवार पीढियों' से यहाँ राजस्थान में रह रहा है। मेरे पिताजी भी यहाँ राज्य सेवा में रहकर रिटायर हुए। बच्ची भी यहीं पैदा हुई है और यहीं इसने अपनी सारी पढाई की है। मेरी समझ से इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं आनी चाहिए।" वह बोला-''प्राब्लम का फैसला तो आपकी समझ से नहीं, हमारी समझ से होगा।"

खैर, फार्म के साथ अटेच्ड सपोर्टिंग डोक्यूमेन्ट को देखते-देखते अचानक उसकी आँखों में चमक आ गई और उसके ओठों पर एक विषैली मुस्कान तैरने लगी। उसने गर्दन उठाई तथा मेरी आँखों में आँखें डालकर कहा-''इन कागजात के आधार पर तो मूल निवास प्रमाण पत्र बनना बहुत मुश्किल है।" उसकी बात सुनते ही मेेरे कान्फीडेन्स की हवा निकल गई। मैंने पूछा- ''क्या प्राब्लम है?" उसने समझाया-''प्राब्लम ये है कि जिस जिले में आप दस साल से ज्यादा रहे हो, उसमें पिछले तीन वर्षों से लगातार नहीं रह रहे हो और इस जिले में आप अढाई साल से रह रहे हो तो यहाँ आप दस साल से नहीं रह हो। सरकारी कर्मचारी के लिए भी नियम, पिछले तीन वर्षों से लगातार इस जिले में रहने का है। हाँ, 6 महीने बाद यह आराम से बन जाएगा।"

मैंने कहा-''यार 6 दिन बाद तो काउन्सलिंग है। मुझे जयपुर जिले का नहीं राजस्थान का मूल निवासी होने का प्रमाण पत्र दे दो। माँगा भी वही है।" वह बोला-''माँगा तो राजस्थान का जाता है लेकिन नियमानुसार जिले का ही बनाया जाता है। राजस्थान के मूल निवासी होने का प्रमाण पत्र कहीं भी नहीं बनता। सारे पेच इसी बात में हैं। यहाँ तो सारा काम नियमानुसार ही होता है।" मैंने सोचा यार। क्या गजब का दफ्तर है? सारा काम नियमानुसार ही होता है। नियमानुसार का नियम यह है कि सही काम अटकना जरूर चाहिए, भले ही फर्जी काम आराम से हो जाए।

मेरी बात सुनकर उसे झटका लगा। वह कहने लगा-''अब आप चाहे जो समझिए साहब पर काम तो नियमानुसार ही होगा। हम तो साहब के सामने पुट अप कर देंगे। फिर उनके विवेक पर है वे करें, ना करें। वैसे सरकारी काम में कौनसा अफसर है जो अपना विवेक लगाएगा? सरकारी विवेक तो हम हैं, हमारा विवेक ही काम आएगा।"

उसका सारगर्भित व्याख्यान सुनकर मेरे होश उड़ हो गए। मैंने विनम्र होते हुए कहा-''भले आदमी। कई एग्जाम देने के बाद एक ही काउन्सलिंग में उसका नंबर आया है। यह भी निकल गई तो गजब हो जाएगा। ऐसा करो मुझे साहब से मिलवा दो।" वह बोला-''अभी तो नहीं है। आए तब मिल लेना।" मैंने पूछा-''कब आएँगे।" वह बोला-''इस बारे में हम क्या कह सकते हैं? वो हमारे साहब हैं, हम उनके साहब थोड़े ही हैं। वैसे वो साहब भी क्या है जो हर समय सीट पर बैठा मिल जाए।"

मैं समझ गया कि मेरा काम अटक चुका है। मैंने हँसते हुए कहा-''काम को इस पुराने तरीके से अटकाने में आपको भी क्या मजा आया होगा जब मुझे अटकवाने में ही नहीं आया।" उसने पूछा-''क्या मतलब?" मैंने कहा-''आप लोग काम करने की बजाय काम को अटकवाने के लिए बैठे हैं तो फिर तरीका भी इनोवेटिव होनो चाहिए। इसके लिए आप मूल निवास प्रमाण पत्र के लिए आवेदन पत्र का नया परफोरमा बनाइए और उसमें आवेदक से पूछिए 1. नाम 2. पिता का नाम 3. ये कब से आपके पिता हैं। 4. पिछले दस वर्षों में कौन-कौन आपके पिता रहे? 5. पिछले तीन वर्षों से लगातार पिता का नाम? आदि।" मेरी बात सुनकर वह खुद हँसते-हँसते लोटपोट हो गया। हँसते हुए उसने अगले दिन आने की तथा एक और सर्पोटिंग डोक्यूमेन्ट लाने की कारगर सलाह दी।

खैर अगले दिन मुझे मूल निवास प्रमाण पत्र मिल गया लेकिन मैं सोचने लगा कि सतयुग में एक सावित्री हुई थी जो यमराज से अपने पति के प्राण लेकर आ गई थी। उसने एक असम्भव सा काम कर दिखाया था। लेकिन इस कलयुग में उसे अगर यह कहा जाए कि आप कलेक्ट्रेट जाकर अपने बच्चे का मूल निवास प्रमाण पत्र बनवा लाओ तो उसके हाथ-पाँव फूल जाएँगे।

Tuesday, April 27, 2010

सरस्वती जी का त्याग पत्र

पिछले दिनों सरस्वती जी ने ब्रह्माजी को यह कहते हुए त्याग पत्र दे दिया कि अब मुझे नहीं रहना सरस्वती। आप मेरी जगह किसी अन्य सरस्वती को नियुक्त कर दीजिए। ब्रह्माजी ने पूछा-''देवी आप इतनी कुपित किसलिए हैं। ऐसा क्या हो गया जो आप अपना पद त्याग देने को आमादा हैं? सरस्वती जी ने जवाब दिया-''मैं अभी-अभी एक कवि सम्मेलन सुनकर आ रही हूँ। उस कवि सम्मेलन को सुनने के पश्चात् मैंने यह तय किया है कि मुझे अपने पद पर बने रहने का अब अधिकार नहीं। नैतिकता के नाते मुझे अपना पद छोड़ देना चाहिए।"
ब्रह्माजी ने पूछा- देवी! ऐसा क्या हो गया उस कवि सम्मेलन में जो आप अपना पद छोड़ देने पर आमादा हैं? सरस्वती जी ने जवाब दिया-''क्या-क्या नहीं हुआ? कवि कह रहा था कविता मेरी है और कविता कह रही थी मैं दूसरे की हूँ। कवि कह रहा था कि जो रचना मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, यह कविता है। और वह रचना कह रही थी कि मैं चुटकुला हूँ। आप ही बताओ इन टिपीकल मुकदमों का फैसला कैसे किया जाए?"
सरस्वती जी की बात सुनकर ब्रह्माजी का दिमाग चकराने लगा। उन्होंने कहा-''देवी! लेकिन ये सारे कवि तो आपके ही उपासक हैं। इन्हें समझा दीजिए। त्याग पत्र देने की क्या जरुरत?" लेकिन बीच में ही बात काटते हुए सरस्वतीजी ने कहा- ''आपको पता नहीं है प्रभो! आजकल के कवि बड़े चालाक हो गए हैं। ये ऊपर से तो मुझमें श्रद्धा दर्शाते है लेकिन सच्चे मन से प्यार लक्ष्मी जी से ही करते हैं। ऐसे में उचित यह रहेगा कि आप मेरे डिपार्टमेंट का एडीशनल चार्ज लक्ष्मी जी को ही दे दीजिए। रही इन मुकदमों की बात तो इनका फैसला तो उनका वाहन ही कर देगा। जाति बिरादरी का फैसला तो वैसे भी भारतीय न्याय शास्त्र में वैसे भी सर्वमान्य होता है।"
ब्रह्माजी बोले-''देवी आपका सुझाव बुरा नहीं है। लेकिन मैं आपका त्याग पत्र स्वीकार नहीं करुँगा। आप मुझे बताएँ कि आप आजकल के इन कवियों से आप क्या कहना चाहती हैं? मैं अभी सबको एस.एम.एस. कर देता हूँ। सब ठीक हो जाएँगे।"
इस पर ब्रह्माजी से सरस्वती जी ने जो कहा वह संस्कृत भाषा में एक श्लोक के रूप में था। उस श्लोक का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है- हे ब्रह्माजी! आप इन कवियों को समझाइये कि कविता नहीं लिखने से न तो अपयश मिलता है। न किसी प्रकार की कोई व्याधि होती है, न पाप लगता और न ही नरक की प्राप्ति होती है। लेकिन बुरी कविता लिखने से और चुराई हुई कविता सुनाने से तथा चुटकुले को कविता बताने से इन चारों की प्राप्ति एक साथ होती है।

Saturday, April 24, 2010

आई.पी. एल. का नफा नुकसान

मेरी जितनी निष्ठा क्रिकेट में है उतनी ही निष्ठा अगर भगवान में रही होती तो मुझे भगवान के दर्शन अवश्य हो जाते लेकिन आज तक मुझे आई.पी.एल. के मैचों में क्रिकेट के दर्शन नहीं हुए। जैसे कवि सम्मेलनों में कविता नाम मात्र की होती है वैसे ही आई.पी.एल. में भी क्रिकेट सिर्फ प्रतीकात्मक ही रहती है। इसलिए मैं कहता रहता हूँ कि स्कूल में पढ़ाई, राजनीति में सिद्धान्त और फिल्म में कहानी तो फिर भी मिल सकती है लेकिन आई.पी.एल. में भी क्रिकेट का मिलना बहुत मुश्किल है।
आई.पी.एल. के बारे में हुए ताजा खुलासे ने सबको बता दिया है कि बेट और बॉल का खेल तो प्रतीकात्मक है। असली खेल तो पैसे का है जिसे फिल्म स्टार, उद्योगपति और राजनेता मिलकर खेल रहे हैं जिसे क्रिकेट के बहाने स्टेडियम में जाइए वहाँ आपको चीयर लीडर्स के ठुमके मिलेंगे, शराब मिलेगी, सट्टा मिलेगा लेकिन क्रिकेट भी दिखाई दे तो बताना।
पहले मैदान में सिर्फ क्रिकेट थी। फिर क्रिकेट के जरिये कारोबार होने लगा। अब कारोबार के जरिये क्रिकेट हो रही है। पहले सिर्फ खेल था। फिर खेल में पैसा आया। अब तो सिर्फ पैसे का ही खेल है। क्रिकेट में काला धन आता है तथा सफेद होकर चला जाता है। क्रिकेट, अब खेल नहीं रहा अपितु धन की धुलाई का धोबीघाट हो गया है।
सरकार जाँच कर रही है कि पैसा कहीं से आ रहा है और कहाँ जा रहा है। सीधी सी बात है। गरीबों की जेब से निकलकर अमीरों की तिजोरी में जा रहा है। पैसा गतिमान है। वह जब अमीरों की तिजोरी से निकलता है तो घूम फिरकर वापस उसी में लौट जाता है लेकिन गरीबों की जेब से एक बार निकला हुआ पैसा वापस नहीं लौटता। पैसे का प्रवाह बहुत तेज होता है। जो भी रास्ते में आता है, वह बह जाता है। अभी पिछले सप्ताह ही एक मंत्री जी की कुर्सी बह गई। एक-दो की और बहने वाली है।
कुल मिलाकर आई.पी.एल. में नफा राजनेताओं, उद्योगपतियों, फिल्म स्टार्स का ही है। नुकसान हम सबका है। आई.पी.एल. की यही कारीगरी है। उसने मुझ जैसे करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों का टाइम इक्टठा किया तथा कार्पोरेट जगत् को बल्क में बेच दिया। हमारी समझ में सिर्फ यह आता है कि जो दूसरों का समय इक्टठा करके उसे बल्क में बेच खाता है, वह नि:संदेह खरबपति हो जाता है लेकिन जिसका समय बेचा जाता है उसे कुछ नहीं मिलता है। वह सिर्फ रोता है क्योंकि सारा नफा उसी के नुकसान की कीमत पर होता है।

Saturday, February 6, 2010

प्रेमी-प्रेमिका युद्ध


प्रेमिका बोली ताने मार
अरे ओ मजनूं के अवतार!
जैसे कोई रद्‌दी अखबार!

ढोंगी जैसे कोई पुजारी
खतरनाक ज्यों बस सरकारी
तू और तेरी ईमानदारी
जैसे गाँवों में पटवारी

रोज समय पर मुझे बुलाता
नल की तरह लेट खुद आता
फिर भी कारण नहीं बताता
बोल-बोल तू क्यों हैं मौन?
आदमी है या टेलीफोन?
कहाँ गई तेरी डायलटोन?

प्रेमी बोला-ओ मेरी रानी!
फ्लाप फिल्म की घिसी कहानी
देरी से जो भी आता है
बडा वही माना जाता है
तुमको मैं ऐसे समझाता
पहुँचा करती चिट्‌ठी जल्दी
तार सदा देरी से जाता

प्रेमिका बोली होकर खारी
वाह रे बुद्धि से ब्रह्मचारी!
बडा स्वयं को बतलायेगा
नखरे इतने दिखलायेगा
नए बहाने सरकाएगा
हर वादे को बिसराएगा
आश्वासन से भरमाएगा
मुझको क्या मालूम था प्यारे
तू भी नेता बन जायेगा

अस्पताल का वार्ड है तू
फर्जी राशन कार्ड है तू
नकली चकाचौंध है तू
बढती हुई तोंद है तू
पोस्ट ऑफिस का गोंद है तू

शाम को मेरे घर पर आना
खुद आकर मेरे डैडी से
शादी की तू बात चलाना

प्रेमी बोला-ओ माई डीयर!
एक बात समझ लो क्लीयर
डैडी दिख जाता जब तेरा
बदन काँप जाता है मेरा
मेरे मन में भय जगता है
प्रेम सडक पर तेरा डैडी
मुझे स्पीड ब्रेकर लगता है

प्रेमिका बोली पर तू बढ जा
अपनी ही चाहत पर अड जा
बीमे के एजेण्ट सरीखा
जाकर छाती पर ही चढ जा

प्रेमी बोला-ओ मेरी प्यारी!
मुझको डर लगता है भारी
आखिर कैसे रिस्क उठाऊँ
तेरा बाप पुलिस अधिकारी

सारा मजनूँपन हर लेगा
नमक वो चमडी में भर देगा
तेरे बस थप्पड मारेगा
मुझको तो अन्दर कर देगा

प्रेमी को जब डरते देखा
आत्म समर्पण करते देखा
प्रेमिका विकराल हो गई
आँखे उसकी लाल हो गई

कहने लगी ओ पंचर टायर!
पढे-लिखे से ज्यादा कायर!
अब तक नहीं समझ में आया
तूने जीवन व्यर्थ गँवाया
सोचता है जो कर नहीं पाता
वाह रे भारत के मतदाता!