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Monday, March 30, 2015

सबकी नियति निराली

किसी का बर्तन भरा हुआ है
       किसी का बर्तन खाली
            जग में सबकी नियति निराली ।

भिन्न -भिन्न है नियति सभी की
        हम ऐसे समझाएँ
भिन्न-भिन्न हाथों में हैं जैसे
        भिन्न -भिन्न रेखाएँ

किसी को झूठी पत्तल मिलती
      किसी को सज्जित थाली
            जग में सबकी नियति निराली

अपनी नियति भोगते पत्थर
        ज्यों सरिता में बहते
कहाँ पे जन्मे ,कहाँ पले हम
        आज कहाँ पर रहते !

कहीं अमावस का अँधियारा
     और कहीं दीवाली
            जग में सबकी नियति निराली

मंच,पटकथा, पात्र, दृश्य हैं
        यहाँ सुनिश्चित सारे
अभिनेता, अभिनेत्री, दर्शक
        सब अबोध बेचारे

कोई विस्मय से देखे और
     किसी ने दृष्टि घुमा ली
           जग में सबकी नियति निराली ।

Wednesday, August 24, 2011

अन्ना की अपील












धीरे-धीरे जकड़ रही हैं जंजीरें
धीरे-धीरे बिगड़ रही हैं तकदीरें
धीरे-धीरे कर्ज चढ़ा ही जाता है
भ्रष्टाचार का मर्ज बढ़ा ही जाता है

धीरे-धीरे हम लांघ रहे सीमा हर बर्बादी की
फिर से लडऩे ही होगी इक और जंग आजादी की


मैं अन्ना हूँ, जुल्म नहीं सह सकता हूँ
बर्बादी पर मौन नहीं रह सकता हूँ
मैं बंधक आजादी की तस्वीर दिखाने आया हूँ
गली-गली में नई क्रांति का ज्वार जगाने आया हूँ
देश के सिर से भ्रष्टाचार का दाग मिटाने आया हूँ
आजादी का खतरे में है, बस ये समझाने आया हूँ

खतरे में अस्मत लगती है गाँधी वाली खादी की
फिर से लडऩी ही होगी एक और जंग आजादी की

मैं अपने शब्दों में अब बारूद भर रहा हूँ प्यारे
लोकतंत्र खतरे में है आगाह कर रहा हूँ प्यारे
फिर इक अडिय़ल सत्ता से टकराने को तैयार रहो
कफन बाँधकर वंदेमातरम गाने को तैयार रहो
दीवारों में फिर बच्चे चिनवाने को तैयार रहो
स्वाभिमान से घास की रोटी खाने को तैयार रहो

भूल नहीं जाना बैचेनी मेरी काव्य मुनादी की
फिर से लडऩी ही होगी इक और जंग आजादी की