Saturday, April 4, 2015

बिखराव जैसी है!

प्रेम की पूरी कथा, अलगाव जैसी है ।
यह समूची व्यवस्था बिखराव जैसी है ।।

इस क्षितिज से उस क्षितिज तक
       और उसके पार आगे
मन हो आरूढ प्रतिपल
        खूब भागे हम अभागे
दौड़ते ही हम रहे पर बढ न पाए
मार्गदर्शी सूचना तक पढ न पाए

जिन्दगी की यात्रा भटकाव जैसी है
यह समूची व्यवस्था बिखराव जैसी है

जन्म से पहले जगत में
     मृत्यु के पश्चात है क्या ?
पूछता हूँ मैं स्वयं से
     इस विषय में ज्ञात है क्या ?
ज्ञान कहलातीं अधूरी सूचनाएँ
आज जो बनवा रही हैं योजनाएँ

स्वप्न की दुनिया जुए के दाव जैसी है
यह समूची व्यवस्था बिखराव जैसी है।

Friday, April 3, 2015

जीवन देवासुर संग्राम

मेरे भीतर ही है रावण
      मेरे भीतर राम
              जीवन देवासुर संग्राम ।

रात अँधेरी उजियारा दिन
रहें नहीं संग्राम किए बिन
       साँझ के पीछे सुबह पड़ी है
            सुबह केपीछे शाम
                  जीवन देवासुर संग्राम

ये विपरीत परस्पर ऐसे
शीत -ऊष्ण होते हैं जैसे
     नित्य युद्धरत हैं दोनों ही
         किए बिना विश्राम
                जीवन देवासुर संग्राम

एक बार बिसराकर अनबन
कर डाला सागर का मंथन
          भोले के हिस्से विष आया
                निकला यह परिणाम
                      जीवन देवासर संग्राम

समझो और स्वयं ही जानो
निज कर्तव्य कर्म पहचानो
       लंका में मन भटके अथवा
            बसे अयोध्या धाम
                   जीवन देवासुर संग्राम

भ्रमित जी रहे सब नर-नारी
बीती उम्र स्वप्न में सारी
         क्या करने आए थे जग में
               करने लगे क्या काम ?
                     जीवन देवासुर संग्राम ।।

Monday, March 30, 2015

सबकी नियति निराली

किसी का बर्तन भरा हुआ है
       किसी का बर्तन खाली
            जग में सबकी नियति निराली ।

भिन्न -भिन्न है नियति सभी की
        हम ऐसे समझाएँ
भिन्न-भिन्न हाथों में हैं जैसे
        भिन्न -भिन्न रेखाएँ

किसी को झूठी पत्तल मिलती
      किसी को सज्जित थाली
            जग में सबकी नियति निराली

अपनी नियति भोगते पत्थर
        ज्यों सरिता में बहते
कहाँ पे जन्मे ,कहाँ पले हम
        आज कहाँ पर रहते !

कहीं अमावस का अँधियारा
     और कहीं दीवाली
            जग में सबकी नियति निराली

मंच,पटकथा, पात्र, दृश्य हैं
        यहाँ सुनिश्चित सारे
अभिनेता, अभिनेत्री, दर्शक
        सब अबोध बेचारे

कोई विस्मय से देखे और
     किसी ने दृष्टि घुमा ली
           जग में सबकी नियति निराली ।

Friday, January 18, 2013


Wednesday, August 24, 2011

अन्ना की अपील












धीरे-धीरे जकड़ रही हैं जंजीरें
धीरे-धीरे बिगड़ रही हैं तकदीरें
धीरे-धीरे कर्ज चढ़ा ही जाता है
भ्रष्टाचार का मर्ज बढ़ा ही जाता है

धीरे-धीरे हम लांघ रहे सीमा हर बर्बादी की
फिर से लडऩे ही होगी इक और जंग आजादी की


मैं अन्ना हूँ, जुल्म नहीं सह सकता हूँ
बर्बादी पर मौन नहीं रह सकता हूँ
मैं बंधक आजादी की तस्वीर दिखाने आया हूँ
गली-गली में नई क्रांति का ज्वार जगाने आया हूँ
देश के सिर से भ्रष्टाचार का दाग मिटाने आया हूँ
आजादी का खतरे में है, बस ये समझाने आया हूँ

खतरे में अस्मत लगती है गाँधी वाली खादी की
फिर से लडऩी ही होगी एक और जंग आजादी की

मैं अपने शब्दों में अब बारूद भर रहा हूँ प्यारे
लोकतंत्र खतरे में है आगाह कर रहा हूँ प्यारे
फिर इक अडिय़ल सत्ता से टकराने को तैयार रहो
कफन बाँधकर वंदेमातरम गाने को तैयार रहो
दीवारों में फिर बच्चे चिनवाने को तैयार रहो
स्वाभिमान से घास की रोटी खाने को तैयार रहो

भूल नहीं जाना बैचेनी मेरी काव्य मुनादी की
फिर से लडऩी ही होगी इक और जंग आजादी की

Thursday, December 9, 2010

जन्मपत्री बनाम कर्मपत्री

मित्र ने कहा
लड़का-लड़की
शादी के लिए बेकरार!
दोनों के परिवार भी तैयार!!
लेकिन उनकी जन्मपत्रियों में
गुण नहीं मिल रहे हैं यार!!!

मैंने कहा- दोस्त!
नई तकनीक काम में लाओ
जन्मपत्रियों में
गुण नहीं मिल रहे हैं
तो कर्मपत्रियों के दोष मिलाओ

वह दोनों के
समान दोषों की
सूची बनाकर लाया

और बताया-
लड़का भी देरी से उठता है
लड़की भी देरी से उठती है
लड़का भी सिगरेट पीता है
लड़की भी सिगरेट पीती है
लड़का भी पढ़ाई में डफर
लड़की भी पढ़ाई में सिफर
लड़का भी आवारा
लड़की भी आवारा
लड़का भी रोज शेव बनाता है
लड़की भी रोज शेव बनाती है

मैंने कहा-
उत्तम दोष योग है
यह रिश्ता कभी नहीं तिड़केगा
अरे! दो घर बिगड़ते
अब एक ही बिगड़ेगा

रिश्ता करवाना ही है
तो जन्मपत्रियों में
खोपड़ी बाद में खपाओ
पहले दोनों की ब्लड टेस्ट की
रिपोर्ट मँगवाओ
एचआईवी निगेटिव पाओ
तब गुण-दोष मिलाओ
सलाह का यही सार है
बचाव ही उपचार है

Wednesday, July 28, 2010

रेल दुर्घटना



अब अगर कोई किसी से भी यह सवाल पूछे कि आजकल भारतीय रेलें कैसी हैं? तो जवाब मिलेगा कि बिल्कुल रेलमंत्री जैसी हैं। जैसी रेलमंत्री हैं, वैसी ही रेलें हैं। दोनों को ही सिग्नल दिखाई नहीं देते। दोनों ही चाहे जब, जिस किसी से टकराने के मूड में रहती हैं। दोनों के ही पास ऐसे टकराव की कोई वजह नहीं होती। हाँ टक्कर इतनी भयानक होती है कि देखने वाले डर जाते हैं। कुछ तो टक्कर की दहशत से ही मर जाते हैं।
पिछले चुनावों में उनकी टी.एम.सी. एक्सप्रेस ने सीपीएम एक्सप्रेस के ऐसी टक्कर मारी कि कांग्रेस का बायां और बीजेपी का दायाँ कान फट गया। घायल सीपीएम तो तब से अब तक शायद अस्पताल में भर्ती है।
रेल दुर्घटना में कई लोग मरे। जो मरे उन पर आश्रित लोग जीते जी ही मरे समान हो गए। रेल मंत्री का सारा ध्यान पश्चिम बंगाल के चुनावों पर है। रेल यात्री मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष गुहार लगा रहे हैं कि वे पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव जल्दी करवा दें। अगर वे जीत गईं तो पश्चिम बंगाल की सीएम बन जाएँगी और और अगर हार गई तो प्रधानमंत्री में उनका मंत्रालय बदलने की हिम्मत आ जाएगी। दोनों ही स्थितियों में रेलयात्रियों को राहत मिल जाएगी।
लोग कहते हैं कि नैतिकता के आधार पर उन्हें त्यागपत्र देना चाहिए। यह गलत बात है। राजनीति में नैतिकता को आधार बनाना गलत है। आधार हमेशा नीचे रहता है। ऐसे में नैतिकता के आधार पर चलने वाला राजनेता नैतिकता को कुचल देता है। नैतिकता की रक्षा करना प्रत्येक राजनेता का धर्म है। जरूरी है कि आधार वह स्वयं बने और फिर नैतिकता को जैसा चाहे वैसा चलाए। आजकल की राजनीति यही कहती है। अगर रेल दुर्घटनाओं में इजाफा हुआ तो हो सकता है प्रधानमंत्री जनसंख्या नियंत्रण विभाग का भी प्रभार उन्हें सौंप दें।
फिलहाल उन्हें ध्यान रखना होगा कि फिलहाल वे रेलमंत्री हैं, जनसंख्या नियंत्रण मंत्री नहीं। वे चाहें तो यह बयान जारी कर सकती हैं कि रेल दुर्घटनाओं से बीमा कम्पनियों के कारोबार में उछाल आएगा जो कि बीमे के कारोबार और देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है।