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Thursday, October 22, 2015

जितने घाव दिए हैं तुमने

जितने घाव दिए हैं तुमने, वे मैंने इसलिए सहेजे ।
नयन नीर से पीड़ाओं की औषधियाँ तैयार करूँगा ।।

              मैं तो ऐसा घर हूँ जिसमें
                 मात्र वेदनाएँ रहतीं हैं
             निकली जो नयनों से नदियाँ
                 पहले वे भीतर बहतीं हैं
जितने घाव दिए हैं तुमने, वे सब वंशवृद्धि में रत हैं ।
घावों की इस वंशबेल का सींच - सींच सत्कार करूँगा ।।

              हो सकता है पूर्वजन्म में
                  मैंने कुछ पीड़ाएँ दी हों
              सम्भव है वे पुनर्भरण में
                 तुमने मुझे समर्पित कीं हों
जितने घाव दिए हैं तुमने, वे उस ऋण का चुकतारा हैं
पाउँगा - जीउँगा इसको, आगे नहीं उधार करूँगा ।।

             जीवन खाता बही सरीखा
                  लेन - देन सारे हैं अंकित
             सौदा कोई नया न कर लूँ 
                  सोच - सोचकर हूँ आतंकित
जितने घाव दिए हैं तुमने, सहनशक्ति को परख रहे वे।
हँसकर सहन करुँगा लेकिन नया नहीं व्यवहार करूँगा ।।

             किसे पता है इस दुनिया में
                  कितनी बार और आना है
            आए तो भी क्या होंगे हम
                  यह रहस्य किसने जाना है
जितने घाव दिए हैं तुमने, वे जैसे अनमोल धरोहर।
भीतर-भीतर ही चीखूँगा, व्यक्त किन्तु आभार करूँगा ।।

            मेरे पास पुष्प हैं केवल
               तुम चाहे सारे ले जाओ
            मैं ना कभी उल्हाने दूँगा
                चाहे प्रतिपल शूल चुभाओ
जितने घाव दिए हैं तुमने, वे सब अब तक हरे-हरे हैं
प्रायश्चित के पावन पथ का मैं इनसे शृंगार करूँगा ।।

-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)
सम्पर्क : 0141-2757575
मोबाइल : 98290-70330
ईमेल : kavidube@gmail.com

Wednesday, October 21, 2015

सब अपनाएँ शाकाहार

मांस नहीं खाएँ, ना ही जीवों को सताएँ
यह सबको बताएँ, सब धर्मों का सार
जैसा खाएँ अन्न, होगा वैसा ही मन
हम सब अपनाएँ शाकाहार

तनिक नहीं शरमाते हो, खुद को सभ्य बताते हो
भोले भाले जीवों को, काट-काट कर खाते हो
यदि जीवों को खाओगे तो, सचमुच पछताओगे
आने वाली नस्लों को, आदमखोर बनाओगे

करते हो कमाल, खाते जीवों को उबाल
फिर ठोकते हो ताल, तुमको धिक्कार
जैसा खाएँ अन्न, होगा वैसा ही मन
हम सब अपनाएँ शाकाहार

कैसे मनुज महान बने, धरती का भगवान बने
जीवों की लाशें खाकर, पेट जो कब्रिस्तान बने
नहीं समझ में आता है, अण्डा रोग बढ़ाता है
तुम न कभी अण्डे खाते, अण्डा तुमको खाता है

सण्डे हो या मण्डे, तुम कभी न खाओ अण्डे
सब छोड़ हथकण्डे, करो इसपे विचार
जैसा खाएँ अन्न, होगा वैसा ही मन
हम सब अपनाएँ शाकाहार

माने चाहे ना माने, सच्चाई को पहचाने
मानवता के माथे पर, हैं कलंक बूचडख़ाने
जितना चाहो धर्म करो, सारे ही शुभ कर्म करो
पशुओं की बलि चढ़ाते हो, इंसानों कुछ शर्म करो

थोड़ी भक्ति भी बढ़ाओ, थोड़ी शक्ति भी जुटाओ
अपनी ही बलि चढ़ाओ, तब माने संसार
जैसा खाएँ अन्न, होगा वैसा ही मन
हम सब अपनाएँ शाकाहार

-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)
सम्पर्क : 0141-2757575
मोबाइल : 98290-70330
ईमेल : kavidube@gmail.com

Tuesday, October 20, 2015

गीत

कौन जानता है जीवन के अगले पल में क्या होना है ?
बुझते-बुझते कई जल गए, कई बुझ गए जलते- जलते ।।

    समझो तो अपने जीवन में
        आने वाला पल कैसा है ?
    जिसमें घुप्प अँधेरा केवल
        ऐसी एक गुफा जैसा है !
उसी गुफा के भीतर जाकर  मैंने बार- बार देखा है
रुकते-रुकते कई चल गए, कई रुक गए चलते- चलते ।।

    जग में आए और गए सब
        जब भी जैसा जिनका क्रम था
    कई लोग ऐसे भी देखे
        जिन्हें सूर्य होने का भ्रम था
तम के सम्मुख समरांगण में उदय-अस्त का खेल निराला
उगते-उगते कई ढल गए, कई उग गए ढलते- ढलते ।।

    कुछ यायावर आगे निकले
        कुछ यायावर हमसे पिछड़े
    कुछ यायावर साथ चले तो
        कुछ यायावर असमय बिछुड़े
सम्बन्धों के इस अरण्य में ऐसा भी होता आया है
भाते-भाते कई खल गए, कई भा गए खलते-खलते ।।

    सपने-सा संसार सलोना
        जीने का रोमांच सघन है
    पर भविष्य से अनुमानों की
        जैसे जन्मजात अनबन है
हर रहस्य के सिंहद्वार पर लटके हुए नियति के ताले
खुलते-खुलते कई छल गए, कई खुल गए छलते- छलते ।।

-सुरेन्द्र दुबे (जयपुर)
सम्पर्क : 0141-2757575
मोबाइल : 98290-70330
ईमेल : kavidube@gmail.com