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Saturday, April 17, 2010

कहो ना कार है!

कार और सरकार में एक बड़ी समानता यह है कि ये दोनों आदमी का स्टेट्स सैट करती हैं। इसलिए कहा जाता है कि कार तो कार है, भले ही कबाड़ की हो। सरकार तो सरकार है भले ही जुगाड़ (गठबन्धन) की हो। कबाड़ की कार और जुगाड़ की सरकार चलाने वाला यह जानता है कि उसे रह-रह कर किश्तें चुकानी है। अगर किश्तें नहीं चुका पाया तो अपनी इज्जत गंवानी है।
प्रसंग शादी के लिए रिश्ता तय करने का था। लड़के का पिता अर्द्धआदर्शवादी था। वह अपने मुँह से तो दहेज की माँग नहीं करना चाहता था लेकिन अपने कानों से जरूर सुनना चाहता था कि लड़की का पिता दहेज में क्या-क्या देने वाला है? इसलिए वह न तो 'हाँ' कर रहा था न ही 'ना' कर रहा था। तभी चतुर बिचोलिये ने मोर्चा सम्हाला। उसने लड़के और लड़की के पिता को सुनाते हुए एक गाना गुनगुनाया-
लड़का खुद लड़की से
शादी करने को बेकरार है
कहो ना कार है!

लड़की के पिता ने ज्योंही कहा वह दहेज में कार देने वाला है- बात बन गई। अगर कार से नहीं बनती तो वह कहता कि दहेज में कार तो देंगे ही और साथ में एक साल का पैट्रोल का खर्चा मुफ्त, स्कीम में! खैर, स्कीम की नौबत नहीं आई।
सब कार देखते हैं। कोई नहीं पूछता कि कार कैसे पाई है। नकद खरीदी है, कर्ज में ली है या दहेज में आई है। अगर देहज में पाई है तो क्या कहने। नेकी और पूछ-पूछ। मुफ्त का माल हम लोगों को बहुत भाता है। इसलिए दहेज में कार मिलने की बात होते ही लड़के के पिता को साकार होता दिखाई दिया सपना। वह मन ही मन गाने लगा-
राम नाम जपना
पराया माल अपना

नई नवेली लाडी को नई नवेली गाड़ी में बिठाकर दुल्हा फूला नहीं समा रहा था। वह गाड़ी खुद चला रहा था। दुल्हन को सुसराल से अपने घर ला रहा था। मुफ्त का माल मिला था। इसलिए मन ही मन इतरा रहा था। तभी हाईवे पर खड़ी एक अन्य कार ने उसकी कार को ओवरटेक किया। चार-पाँच मुस्टण्डे उतरे उन्होंने दुल्हा और दुल्हन की कार को रोका उन्हें उतारा और गाड़ी को जबरन उठाकर ले गए। तब बात यों समझ में आई थी कि ससुर जी ने कार छ: महीने पहले लोन पर उठाई थी। कार तो नई-नई थी लेकिन एक भी किश्त नहीं चुकाई थी। इसलिए लोन की कार को फाइनेन्सर का फ्रीलांसर उठाकर ले गया। विरोध करने पर दुल्हे के दो-चार हाथ जमा दिए। ये तो अच्छा हुआ कि उन्होंने गाड़ी ही सीज की। लाडी को सीज नहीं किया। वरना लेने के देने पड़ जाते। मुफ्त की कार में सवार मुफ्त खोर अपनी सुहागरात जंगल में सड़क के किनारे ही मनाते। इसलिए कहा गया है कि-
पैसा खूब कमाइए, बिन पैसा सब सून।
बिन पैसे तो मनेगा सड़क पे हनीमून॥